बीजेपी की बढ़त, क्षेत्रीय पहचान की राजनीति पर दबाव
बीजेपी ने राजनीति को राष्ट्रीय ध्रुवीकरण में बदला है; जो क्षेत्रीय दल अपनी विशिष्ट पहचान खोते हैं, वे कमजोर पड़ते हैं, जबकि स्पष्ट विरोधी बचते हैं।
बीजेपी का leverage: पहचान नहीं, गठबंधन और राष्ट्रीय ध्रुवीकरण
बीबीसी हिंदी के मुताबिक, कई विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी की बढ़त ने क्षेत्रीय दलों की पहचान-आधारित राजनीति को कमज़ोर किया है, खासकर तब जब ये दल अपने राज्य-विशिष्ट मुद्दों से हटकर दिल्ली की सत्ता के साथ “समझौता” करते दिखते हैं (
BBC News हिंदी). तर्क सीधा है: बीजेपी अब सिर्फ एक पार्टी नहीं, सत्ता का राष्ट्रीय ढांचा है—और वह क्षेत्रीय दलों को अलग-अलग तोड़कर, या अपने गठबंधन में जोड़कर, उनकी विशिष्टता छीन सकती है।
यही वजह है कि बीजेपी को हर बार हर क्षेत्र में एक साथ नहीं लड़ना पड़ता। वह कुछ जगहों पर हिंदुत्व, कुछ जगहों पर विकास, और कुछ जगहों पर स्थानीय चेहरों के जरिए चुनाव लड़ती है।
Reuters ने 2024 लोकसभा चुनाव से पहले दिखाया था कि पार्टी दक्षिण में पकड़ बनाने, सीमांकन और वोट-रचना बदलने, और क्षेत्रीय सहयोगियों को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही थी। इसका मतलब है: बीजेपी क्षेत्रीय पहचान को नकार नहीं रही, बल्कि उसे अपने राष्ट्रीय ढांचे के भीतर समाहित कर रही है।
किसे फायदा, किसे नुकसान
इस बदलाव का लाभ सबसे ज्यादा बीजेपी को मिला है, क्योंकि वह विपक्षी दलों को “स्थानीय” और अपने आपको “राष्ट्रीय” विकल्प की तरह पेश कर सकती है। लेकिन नुकसान हर क्षेत्रीय दल को नहीं, बल्कि उन दलों को हुआ है जिन्होंने अपनी अलग पहचान को धुंधला किया। The Hindu ने 2024 के बाद लिखा कि AIADMK, BJD, BRS, BSP और YSRCP जैसे दलों ने जब बीजेपी की कई नीतियों पर नरमी दिखाई या “equidistance” की राजनीति अपनाई, तो उनकी राजनीतिक विशिष्टता घटी और वोट बैंक फिसला (
The Hindu)।
दूसरी तरफ, जो दल बीजेपी के खिलाफ साफ खड़े रहे और अपने राज्य-आधारित सामाजिक गठजोड़ को बचाए रखे—जैसे कुछ हद तक DMK, TMC, SP और RJD—उनकी जगह बनी रही। यानी खतरा “क्षेत्रीयता” से नहीं, अस्पष्टता से है। यदि क्षेत्रीय पार्टी केंद्र में सीटों के बदले अपनी वैचारिक धार छोड़ देती है, तो वह अपने ही औचित्य को कमजोर करती है।
यही कारण है कि कांग्रेस के लिए भी यह सवाल बड़ा है। बीबीसी हिंदी के विश्लेषण में विपक्ष की कमजोरी, बिखराव और साझा नेतृत्व के अभाव को प्रमुख बाधा बताया गया है (
BBC News हिंदी). जब तक विपक्ष एकजुट नहीं होगा, क्षेत्रीय दल बीजेपी के खिलाफ “वैकल्पिक राष्ट्रीय कहानी” नहीं बना पाएंगे।
अगला मोड़: कौन अपनी पहचान बचाता है
अगला असली परीक्षण राज्यों में है—महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसी जगहों पर। सवाल यह नहीं कि क्षेत्रीय पार्टियां खत्म हो रही हैं; सवाल यह है कि क्या वे बीजेपी के दबाव में अपनी पहचान को सौदेबाज़ी में बदल देंगी या उसे चुनावी पूंजी की तरह बचाए रखेंगी।
देखना यह है कि क्या विपक्ष कांग्रेस के नेतृत्व में एक स्पष्ट, टिकाऊ गठबंधन बना पाता है, और क्या क्षेत्रीय दल केंद्र के साथ तालमेल के बावजूद अपनी राज्य-आधारित राजनीतिक भाषा बनाए रखते हैं। यही तय करेगा कि आने वाले महीनों में बीजेपी का राष्ट्रीय मॉडल और मजबूत होता है, या क्षेत्रीय प्रतिरोध फिर से अपनी जमीन बनाता है।